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क्या हुआ तेरा वादा, वो कसम, वो इरादा? सारे ‘घोटालेबाज’ यूं ही छूटते रहेंगे क्या? वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम की कलम से

आपको याद है न बोफोर्स मामला ? 1989 के लोकसभा चुनाव के पहले राजीव गांधी की सरकार से बागी होकर निकले वीपी सिंह अपनी रैलियों में बोफोर्स घोटाले में कमीशन खाने वालों की पर्ची जेब से निकालकर दिखाया करते थे . उनका अंदाज कुछ ऐसा होता था कि ये देखो बोफोर्स की दलाली खाने वालों के विदेशी खातों के नंबर , अंदाज ए बयां कुछ ऐसा होता था कि हमारी सरकार बनी नहीं कि ये सब अंदर जाएंगे . उस दौर में बोफोर्स के घोटालों की गूंज गोलों से ज्यादा असर करती थी . जनता तालियां बजाने लगती थी . बोफोर्सनिशाने पर राजीव गांधी होते थे . पहले जनमोर्चा फिर जनता दल के नेता के तौर पर वीपी सिंह राजीव गांधी की भ्रष्टाचारी सरकार के खिलाफ बिगूल फूंकते -फूंकते सत्ता में आ गए लेकिन उन पर्चियों का क्या हुआ ?

स्विस बैंक के खातों के उन नंबरों का क्या हुआ जो वीपी सिंह जेब से निकालकर रैलियों में चमकाया करते थे ?

बोफोर्स को उन कमीशनखोरों को क्यों नहीं पकड़ा गया ? वीपी सिंह की सरकार में साझेदार बीजेपी भी थी . सरकार बनने के बाद कभी लगा ही नहीं कि बोफोर्स के दलालों को पकड़ने में उनकी कोई दिलचस्पी थी . बीजेपी से झगड़े की वजह से वीपी सिंह की सरकार तो खैर जल्दी गिर गई फिर राजीव गांधी भी इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन कभी बोफोर्स का सच सामने नहीं आ पाया. तब भी नहीं जब छह साल के लिए के लिए केन्द्र में वाजपेयी की सरकार रही . 2014 के चुनावों के पहले फिर विपक्ष और खास तौर से नरेन्द्र मोदी के लिए यूपीए सरकार का घोटाला और भ्रष्टाचार ही सबसे बड़ा मुद्दा था . घोटालों के आरोपों से नहाई कांग्रेस मुंह दिखाने लायक नहीं थी . टू जी से लेकर आदर्श सोसाइटी, वाड्रा कांड और कॉमन वेल्थ तक . जनता ने मान लिया कि ये घोटालेबाज सरकार है और इन्हें हटाने के लिए मोदी की देश को जरुरत है . केजरीवाल भी सत्ता में आने के लिए घोटालों की फेहरिश्त लेकर जनता के सामने आया करते थे . शीला दीक्षित समेत बड़ों -बड़ों को जेल भेजने के दावे करते थे . दिल्ली में केजरीवाल की सरकार बन गई . केन्द्र में मोदी की सरकार बन गई. कौन जेल गया है अब तक ?

कल पौने दो लाख करोड़ के 2G घोटाले के सभी आरोपियों के बरी होने की खबर आई , आज आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले मामले में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता अशोक चौव्हाण को मुंबई हाईकोर्ट से राहत की खबर आई है . हाईकोर्ट ने कहा है कि सीबीआई ने मुकदमा चलाने की मंजूरी मांगते वक्त दावा किया था कि उसके पास पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ नए सबूत हैं लेकिन वह कोई सबूत पेश नहीं कर सकी . तो क्या माना जाय कि इन मामलों का भी वही हश्र होगा ? सोशल मीडिया पर बहुत आक्रोष है . लोग गुस्से में सरकार से सवाल पूछ रहे हैं . सरकार की मंशा पर संदेह कर रहे हैं . डीएमके नेताओं से मोदी की मुलाकात को जोड़कर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं . जवाब सरकार को देना है . एक वर्ग वो भी है जो सीबीआई जज सैनी के फैसले का ही पोस्टमॉर्टम कर रहा है . इन सारे सवालों के बीच असली सवाल तो ये है कि अगर घोटाला हुआ तो जांच एजेंसियों के सबूत कैसे कम पड़ गए ?

कल दिल्ली की सीबीआई कोर्ट ने 2जी मामले में सीबीआई और अभियोजन पक्ष को फटकार लगाते हुए यही कहा था कि वो सात साल तक सबूतों का इंतजार करते रहे लेकिन सब बेकार साबित हुआ . सबूतों के आभाव में कल ए राजा , कनिमोझी समेत सभी 17 आरोपी छूट गए . जश्न मनाते , लड्डू खाते , नारे लगाते , नाचते -गाते समर्थकों के साथ अपने -अपने घर चले गए . आज पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चौव्हाण खुश हो रहे होंगे . जिस आदर्श सोसाइटी घोटाले की वजह से अशोक चौह्वाण को मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी थी , उसी में उन्हें राहत मिल गई है . दो बड़े घोटालों का अंजाम जनता ने देख लिया है . चुनावों के समय एक तीसरा बड़ा मामला सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा के जमीन घोटाले का था . 2013 से लेकर 2014 के चुनावों से पहले तक लगातार वाड्रा का मुद्दा गरमाया रहा . ऐसा लगा कि बीजेपी की सरकार बनते ही वाड्रा के घोटालों की फाइलें उन्हें सलाखों के भीतर भेज देगी . राजस्थान में बीजेपी सरकार बने अब तीन साल हो गए हैं . केन्द्र में मोदी सरकार बने साढे तीन साल हो गए हैं . हरियाणा में बीजेपी सरकार बने तीन साल हो गए . तीनों राज्यों में दो तिहाई बहुमत वाली सरकारें हैं , फिर भी वाड्रा का अब तक कुछ नहीं बिगड़ा है . बल्कि वाड्रा पहले से ज्यादा चैन से घूम रहे होंगे क्योंकि चुनाव के पहले उनके भीतर अगर कोई डर भी रहा होगा तो इन तीन सालों में निकल गया होगा . भ्रष्टाचार के तीन बड़े मुद्दे हवा ध्वस्त होते दिख रहे हैं . 2 जी , आदर्श सोसाइटी और वाड्रा जमीन घोटाला कांड . सवाल ये उठता है कि साढे तीन साल के केन्द्र में सरकार होने के बाद भी इन ‘घोटालों ‘ के आरोपियों का अब तक कुछ बिगड़ा क्यों नहीं ? ‘न खाऊंगा , न खाने दूंगा ‘ के नारे ने जनमानस एक ऐसी सरकार की छाप छोड़ी जो किसी भी सूरत में भ्रष्टाचार नहीं होने देगी और भ्रष्टाचारियों को नहीं बख्शेगी . हुआ क्या ? ‘न खाऊंगा , न खाने दूंगा ‘ नारे लगाने वाले पीएम मोदी की सरकार के रहते बड़े बड़े कथित घोटालों के आरोपियों के खिलाफ सीबीआई या जांच एजेंसियां कुछ सबूत क्यों नहीं जुटा पाई ? अब इस सरकार के कार्यकाल के करीब डेढ़ साल बचे हैं . राजस्थान में अगले साल फिर चुनाव होंगे . जरा सोचिए . एक पूरा कार्यकाल निकलने जा रहा है और अब तक किसी घोटाले का कोई बड़ा आरोपी सलाखों के पीछे नहीं पहुंचा है . क्यों नहीं पहुंचा ? अगर सीबीआई ने केस को कमजोर कर दिया , अगर सरकारी वकीलों ने केस को कमजोर कर दिया तो भी जवाबदेही किसकी है ? क्या उस पार्टी और उस सरकार की नहीं जो इन घोटालों के इर्द -गिर्द नारे गढ़कर चुनाव प्रचार करते हुए सत्ता में आई ?

पौने दो लाख करोड़ के जिस 2 जी घोटाले को लेकर कई सालों तक देश में बवाल मचा था , विरोधी दलों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाकर देश में माहौल बनाया था , उसी घोटाले के सभी आरोपी बरी हो गए . बरी भी कैसे हुए ? जैसे मुंबई हाईकोर्ट ने आज महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चौव्हाण को बरी किया . दोनों मामलों में अदालत ने सबूत न जुटा पाने के लिए सीबीआई को कठघरे में खड़ा किया है . 2 जी मामले में तो सीबीआई जज ने यहां तक कहा है कि ‘ मैं सुबह दस बजे से लेकर शाम पांच बजे तक लगातार मामले की सुनवाई की .यहां तक कि गर्मी की छुट्टियों में भी इंतजार करता रहा कि को कोई तो मामले में ठोस सबूत लेकर आएगा लेकिन सब बेकार रहा . एक भी ऐसा सबूत नहीं आया . यह मामला लोगों द्वारा फैलाई गई सामाजिक धारणा या अफवाह से बढ़कर कुछ नहीं था ‘ सीबीआई जज की ये टिप्पणी पूरे अभियोजन पक्ष और सीबीआई पर तमाचे की तरह तो है ही भ्रष्टाचार के खिलाफ गढ़े गए सबसे बड़े नारे के गु्ब्बारे से हवा निकालने की तरह भी है .

कल से बीजेपी और कांग्रेस अपने -अपने ढंग से 2 जी के मुद्दे को उठा रही है . कांग्रेस जश्न मनाते हुए बीजेपी और मोदी सरकार को घेरने में जुटी है तो बीजेपी बार -बार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देकर घोटाले की याद दिला रही है . कांग्रेस और विरोधी दलों के निशाने पर उस समय के सीएजी विनोद राय हैं , जिन्होंने पहली बार अपनी रिपोर्ट में पौने दो करोड़ के घोटाले का खुलासा किया था . सीबीआई जज का ये कहना बहुत मायने रखता है कि एक अंग्रेजी अखबार की खबर को कुछ कलाकार लोगों ने चुनिंदा तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर आसमान में पहुंचा दिया . लोग बड़े घोटाले का अनुमान लगाने लगे जो हुआ ही नहीं था . जज का इशारा सीबीआई की उस चार्जशीट की तरफ भी है , जिसमें कहा गया था कि सरकार को तीस हजार करोड़ का नुकसान हुआ था . मैं इन सबसे अलग एक बात कहता हूं . मान लीजिए कि घोटाला हुआ . पौने दो लाख करोड़ नहीं तो कम का ही हुआ . तीस हजार करोड़ का ही हुआ . या इससे ज्यादा का हुआ तो भी सीबीआई या अभियोजन पक्ष ने इस केस में इतनी ढिलाई क्यों बरती कि जज को लिखना पड़ा कि पूरी जांच दिशाहीन थी और कोई अधिकारी अपनी ही जांच की फाइल या दस्तावेज पर दस्तखत करने को तैयार नहीं था . अगर ये सच है तो इन लापरवाहियों की जिम्मेदारी किसकी है ? किसी की है भी या नहीं ?

साभार

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