भारतीय नेताओं में राष्ट्रवाद या राजवाद की अधिकता!!

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भारतीय नेताओं में राष्ट्रवाद या राजवाद की अधिकता?

भारत के लोगों का यह दुर्भाग्य है कि यहां के ज्यादातर नेता राष्ट्रहित को ताकपर रखकर अपने स्वार्थपुर्ति के लिये सब कुछ कह देते है और कुछ कुछ कर भी देते है। भारत जब गुलामी की जंजीर में जकड कर आजादी के लिये तरस रहा था तब देश के सच्चे वीरों ने राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर भारत को गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिये कमर कसी और देश की आजादी के लिये अपना परिवार, धन, व्यवसाय, जीवन न्यौछावर करके स्वाधीनता दिलाई। और वर्तमान नेताओं को आजादी का आनन्द लेने का परम सौभाग्य मिला, देश के नेताओं में कुछ ऐसे भी है जो वास्तव में वे सम्मान के काबिल नही है, देश की आजादी के लिये अपने जान को न्यौछावर करने वाले देश के महान वीरों ने यह कभी कल्पना भी न की होगी कि आजादी के बाद कुछ ऐसे भी नेता होंगें जो तरह तरह के घोटाला करके,जाति-धर्म की राजनीति करके देश की एकता व अखण्डता को तार-तार करके देश को बेचने में अपनी गद्दारी पुर्ण कार्यों से देश का नाम बढायेंगें।                                         व्यक्ति नेता तब बनता है, जब वह अपनी व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढक़र सोचने लगता है, महसूस करने लगता है, और कार्य करने लगता है।

अफसोस तो तब और होता है जब देश में रहकर देश विरोधी कार्य करते हुये नेता देखे व सुने जाते है लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नही होती है। मोदीजी जब पहली बार संसद भवन में प्रवेश किये तो सबसे पहले उन्होनें संसद की मिट्टी को सिर झुकाकर प्रणाम किया और पुरे देश के नेताओं के मन में राष्ट्रवाद की भावना को जागृत करनें का पुरा प्रयास कियाl बडे शर्म की बात देखने को मिलती है जब भारत के लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभाओं में देश के नेता आपस में विरोध करने  के बहाने देश के नियम कानून को ठेंगा दिखाते हुये अपना उल्लू सीधा करते हैl वास्तव में नेता अपने क्षेत्र के विकास के लिये सही संवेदनशील है तो कम से कम सरकार की तरफ से संचालित योजनाओं का सही सदुपयोग अपने क्षेत्र के पात्रों को देकर करायें।                                 न कि केवल देश को दिखाने के सभा में मारामारी करेंl मै नही कहता कि सभी नेता ‘राजवाद’ के लिये ही चुनाव लडते है लेकिन इनकी संख्या में अधिकता होने से नकारा नही जा सकता हैl देश में यदि कोई भी नेता राष्ट्रवाद के अलावा किसी अन्य वाद की बात करें तो शायद वह भारत को ज्यादा देर तक राजवाद नही चला सकता हैl शर्म आनी चाहिये उन नेताओं को जो सदन में राज्यपाल को वापस जाने की बात करते है, जो किसी धर्म के वोट के लिये किसी अन्य धर्म के लोगों का अपमान करेंl देश में कुछ ऐसे भी नेता है जो भारत में रहकर किसी अन्य देश के पक्ष में नारा लगाते है, किसी अन्य देश के समर्थकों का समर्थन करते हैl सैनिकों पर पत्थरबाजी करने वालों का  बचाव करते है,और सैनिकों पर केस लगाते है और अलगाववादियों को नेता मानते है। भारत में कुथ नेता अपने वोटबैंक के लिये सबकुछ करने को तैयार है, देश के विकास व सुरक्षा से क्या लेना देना? देश में तो कुछ ऐसे कट्टर व  धर्मांध नेता है जो केवल देश को बांटनें के लिये उलूल जुलूल बयान बाजी करके देश के युवाओं को पथभ्रष्ट करने पर तुले है ၊                                    लेकिन कोई शख्स सही अर्थों में तब तक नेता बन ही नहीं सकता जब तकउसके जीवन का अनुभव और जीवन को देखने का तरीका उसकी व्यक्तिगत सीमाओं से परे न चला जाए। यानी नेता बनना या कहें नेतृत्व एक स्वाभाविक प्रक्रिया तब तक नहीं होगी, जब तक कि वह जीवन को देखने, समझने व महसूस करने के तरीके में एक व्यक्ति की सीमाओं से परे नहीं चला जाता

भारत में नेताओं का फैशन है कि वे किसी भी कार्यक्रम में निर्धारित समय से थोडा देर से आते है क्योकिं उनको डर लगता है कि निश्चित समय पर पहुंचने पर खतरा संभावित हैl देश के नेता वोट लेने के समय तो बडी बडी बात करते है लेकिन जीतने के बाद दर्शन भी नही देते है, विकास की तो ऐसी की तैसी ၊

भारत के ज्यादातर नेता राजवाद को ध्यान में रखकर राजनीति में प्रवेश करते है, राष्ट्रवाद तो केवल भाषणों में ज्यादा होता है जबकि हकीकत इनसे अलग हैl यदि देश के नेताओं में सच्ची राष्ट्रीयता जाग जाये तो देश को विश्वगुरू बनने से कोई रोक न सके ၊ क्योकिं नेताओं या सरकारों की लापरवाही से ही अधिकारी भ्रष्ट एवं कामचोर हो जाते हैl आज भी देश में कुछ ऐसे नेता है जो देश व समाज में राष्ट्रवाद की भावना का विकास करके देश को विकसित राष्ट्र बनाने में अपना सहयोग दे रहे है। महात्मा गांधी ने समय की पाबंदी, अंहिसा व सत्यवादिता के माध्यम से लोगों को काम करने की सीख दी लेकिन आज के अधिकतर नेता उल्टा काम कर रहे हैl भारत के माननीयों को ब्रिटेन के सांसद व अन्तर्राष्ट्रीय विकास मंत्री लार्ड बेट्स से सींख लेनी चाहिये जो केवल संसद में मात्र एक मिनट देर से पहुंचे से स्वयं की लापरवाही के कारण इस्तीफा देने की पेशकश कर दी, जबकि भारत में देर की बात छोडिये सत्र में सम्मिलित होने में भी कंजूसी करने वाले कई नेता हैl

भारत देश तभी सही विकास कर सकता है जब यहां के नेता, अधिकारी और आम आदमी अपने कार्यों के प्रति वफादार होकर कार्य करेंl देश में जबतक राष्ट्रवाद का समुचित भावना का विकास नही होगा तबतक देश की सुरक्षा में हमेशा सेंध लगती रहेगी और आगे आने वाली पीढी गुलामी के लिये तैयार रहेl

आइये हमसब मिलकर देश की एकता अखण्डता बनायें रखने में सहयोग करके भारत को विश्वगुरू की पदवी तक पहुचायें ၊

 

संतोष कुमार तिवारी ‘विद्रोही’

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