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​खुलती परतें : पंजाब नेशनल बैंक यानी पीएनबी घोटाले को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं, वे चौंकाने वाली हैं और शर्मनाक भी !

पंजाब नेशनल बैंक यानी पीएनबी घोटाले को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं, वे चौंकाने वाली हैं और शर्मनाक भी। घोटाला करने वालों के मददगार बैंक के आला अफसर ही निकले। मुंबई की विशेष अदालत में सीबीआइ ने इस घोटाले के संबंध में जो पहला आरोपपत्र दायर किया, उसमें यह खुलासा हुआ है।

पंजाब नेशनल बैंक यानी पीएनबी घोटाले को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं, वे चौंकाने वाली हैं और शर्मनाक भी। घोटाला करने वालों के मददगार बैंक के आला अफसर ही निकले। मुंबई की विशेष अदालत में सीबीआइ ने इस घोटाले के संबंध में जो पहला आरोपपत्र दायर किया, उसमें यह खुलासा हुआ है। जांच एजंसी ने कहा कि पंजाब नेशनल बैंक के बारह बड़े अधिकारी नीरव मोदी की मदद कर रहे थे। सीबीआइ ने नीरव मोदी के अलावा जिन बारह बड़े बैंक अधिकारियों को आरोपित किया है, उनमें इलाहाबाद बैंक की प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) उषा अनंतसुब्रह्मण्यम भी हैं। वे 2015 से 2017 के बीच पीएनबी में प्रबंध निदेशक और सीईओ थीं। सीबीआइ ने पीएनबी के दो कार्यकारी निदेशकों और दो चीफ इंटरनल ऑडिटरों को भी आरोपपत्र में नामजद किया है। जाहिर है, जब बैंक प्रमुख सहित इतने बड़े अफसर अगर मेहरबान रहे, तभी नीरव मोदी हजारों करोड़ का घोटाला कर गया। नीरव मोदी की कंपनियों को कर्ज का पैसा जारी करने के लिए जो पत्र (एलओयू) जारी किए गए, वे बिना किसी गारंटी के दिए जाते रहे और यह सब बैंक अधिकारियों के संरक्षण में हुआ। यह भ्रष्ट बैंकिंग तंत्र की मिसाल है ၊၊၊

सीबीआइ द्वाराआरोपपत्र दाखिल करने के बाद वित्त मंत्रालय हरकत में आया है। उसने इन बैंक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। इलाहाबाद बैंक की प्रमुख उषा अनंतसुब्रह्मण्यम और पीएनबी के दो कार्यकारी निदेशकों को हटाने की तैयारी शुरू कर दी गई है। रिजर्व बैंक के भी कुछ अफसर सीबीआइ जांच के घेरे में हैं। वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक अगर इतनी चुस्ती-फुर्ती पहले दिखाते तो इतने बड़े घोटाले से बचा जा सकता था। लेटर ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी एलओयू जारी करने के मामले में रिजर्व बैंक ने तीन बार पीएनबी को चेतावनी जारी की थी और इस बारे में उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी थी। लेकिन पीएनबी ने जानबूझ कर लापरवाही बरतते हुए कोई कदम नहीं उठाया। इन सारी घटनाओं से चरमराती बैंकिंग प्रणाली और पनपते भ्रष्टाचार का पता चलता है।

हाल में रिजर्व बैंक ने इलाहाबाद बैंक, आइडीबीआइ बैंक, इंडियन बैंक, देना बैंक और यूको बैंक पर लगाम कसी है। इलाहाबाद बैंक और देना बैंक पर तो बड़े कर्ज देने पर रोक लगा दी गई है। केंद्रीय बैंक ने अपने इस कदम को त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई करार दिया है। ये दोनों बैंक अब नई नौकरियां भी नहीं दे सकेंगे। बढ़ते एनपीए की वजह से इन बैंकों का घाटा खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है, इसलिए रिजर्व बैंक को सख्त कदम उठाने को मजबूर होना पड़ा। कायदे से ऐसी सक्रियता रिजर्व बैंक को शुरू से दिखानी चाहिए थी। बैंक घोटालों की घटनाओं ने जहां बड़े अधिकारियों की मिलीभगत को उजागर किया है, वहीं बैंकों की ऑडिट व्यवस्था भी सवालों के घेरे में आई है। पीएनबी घोटाला सामने आने के बाद बैंक ने वित्त मंत्रालय को भेजी रिपोर्ट में बताया था कि कई सालों से कुछ शाखाओं का ऑडिट नहीं हुआ। यह तथ्य इस बात की ओर इशारा करता है कि रिजर्व बैंक के अधिकारी भी इसमें शामिल थे। रिजर्व बैंक के पास अपने ऑडिटरों और निरीक्षकों की लंबी-चौड़ी फौज होती है जो कभी भी किसी भी बैंक में किसी भी खाते की जांच कर सकती है। तो फिर नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के खाते क्यों नहीं पकड़ में आए, बैंकिंग व्यवस्था के समक्ष यह गंभीर सवाल है।

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