अगर मंत्री ये कहते है कि बिहार के लोगो को इलाज के लिए दिल्ली एम्स आने की बजाए पटना में ही इलाज कराना होगा तो क्या गलती है?- वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ ओझा की कलम से

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वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ ओझा की कलम से

भले ही आप मंत्री जी को बकलोल कहो या नकारा लेकिन अश्वनी चौबे ने जो कर दिखाया वो पटना एम्स के लिए पिछले चार वर्षों से चुनौती बनी हुई थी।पटना एम्स में पिछले चार वर्षों से न तो डॉक्टरों की नियुक्ति हो रही थी और न ही सहायकों की नतीजा था जो जैसा था वैसे ही चल रहा था।

इसका कारण था यह देश का पहला ऐसा एम्स था जो स्थापित था बिहार में लेकिन यहां की सारी नियुक्ति से लेकर फाइनेंस तक दिल्ली एम्स देखता था।बिहार के डॉक्टर दिल्ली जाकर इंटरव्यू देना नही चाहते थे और बाहर के डॉक्टर पटना आना नही चाहते थे नतीजा था कि चार साल बीत गए।लेकिन इस महीने बिहार का स्वास्थ्य मंत्री होने के चलते इंटरव्यू हुआ और रिजल्ट आया।साथ ही पटना एम्स की एक बड़ी समस्या थी पैसे की कमी चार साल पहले जितना फंड था वह कम पड़ गया था और फाइलें मंत्रालय में दौड़ लगा रही थी।

अब उस पर भी सहमति बनी है।ये जानकारी मुझे तब मिली जब मैं अश्वनी चौबे के बयान के बाद एम्स की हकीकत जानने वहां गया था।अगर एम्स के पीडिएट्रिक्स डिपार्टमेंट की बात करे तो वैसा बिहार के बड़े बड़े अस्पतालों में भी सुविधा नही है।जिस इलाज के लिए बच्चो को लखनऊ या चंडीगढ़ ले जाते है वो इलाज उन्हें यहां मिल रहा है लेकिन लोगो मे जानकारी का अभाव है।अगर मंत्री ये कहते है कि बिहार के लोगो को इलाज के लिए दिल्ली एम्स आने की बजाए पटना में ही इलाज कराना होगा तो क्या गलती है?

हां बशर्ते कि यहां भी सुविधा जल्द से जल्द मिले… अभी भी प्रतिदिन 2 हजार मरीजो का रजिस्ट्रेशन यहां होता है सिर्फ ओपीडी में।

साभार

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