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कश्मीर में पहली बार 2 गरुड़ कमांडो शहीद, इन स्पेशल कमांडोज के बारे में जानिेए खास बातें

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India news live desk

 

जम्मू कश्मीर में पहली बार दो गरुड़ कमांडो के शहादत का मामला सामने आया है. 11 अक्टूबर को बांदीपोरा में एनकाउंटर के दौरान दो कमांडो वीरगति को प्राप्त हो गए हैं. न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक, सार्जंट मिलिंद किशोर और कॉरपोरल नीलेश कुमार को शहादत हासिल हुई है, 12 अक्टूबर को पूरे राजकीय सम्मान के साथ इन जवानों को अंतिम सलामी दी गई.

ऐसे में जानते हैं गरूड़ कमांडोज के बारे में बेहद खास बातें:

एयरफोर्स के जवान होते हैं गरुड़ कमांडो

एयरफोर्स में कुछ जवानों की भर्ती बतौर कमांडो होती है. इनकी ट्रेनिंग पैरा कमांडोज के जैसे ही होती है. गरुड़ कमांडो को एयर ऑपरेशन्स के साथ ही साथ आतंकविरोधी अभियानों से निपटने के लिए तैयार किया जाता है. फिलहाल, इनमें से कुछ कमांडोज को कश्मीर के हालात से निपटने के लिए ट्रेन किया जा रहा है.

आर्मी और नेवी के कमांडोज से थोड़े अलग

नेवी के मार्कोस और आर्मी के पैरा कमांडोज से एयरफोर्स के गरुड़ कमांडोज थोड़ा अलग होते हैं. इन्हें एयरफोर्स में सीधा स्पेशल यूनिट में भर्ती किया जाता है वहीं आर्मी में ऐसा नहीं होता वहां जवानों में से ही कुछ का चयन बतौर कमांडोज होता है. गरुड़ कमांडोज स्पेशल यूनिट के लिए ही होते हैं और रिटायरमेंट के समय तक इसी यूनिट के साथ जुड़े रहते हैं.

देशभर में एयरफोर्स के 7 कमांड हैं औऱ 50 से ज्यादा एयरफोर्स बेस हैं ऐसे में इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी मजबूती के साथ करने की जिम्मेदारी गरुड़ कमांडोज के पास ही होती है. साल 2004 में इस फोर्स की स्थापना की गई थी.

बेहद कठिन होती है ट्रेनिंग

NSG के साथ भी गरुड़ कमांडोज को ट्रेनिंग दी जाती है, इतना ही इंडियन आर्मी भी इन कमांडोज को ट्रेन करता है.

कुल 52 हफ्ते की ट्रेनिंग में हर तरह के जंग से लड़ने की तैयारी कराई जाती है. मिजोरम के ‘काउंटर इन्सर्जन्सी ऐंड जंगल वारफेयर स्कूल’ में भी ट्रेनिंग मिलती है. साफ-साफ कहे तो ये ट्रेनिंग किसी भी स्पेशल फोर्सेज की ट्रेनिंग से मुश्किल और लंबे समय तक होती है.

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